बीमारियों के बारे में बताते हैं ये फिल्में

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बॉलीवुड फिल्मों में एक जॉनर ऐसा भी है जो बीमारियों पर फोकस करता है। आज हम आपको उन बीमारियों के बारे में बता रहे हैं जो फिल्मों के कारण खूब चर्चा में रहीं।

 

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अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘पा‘ में अमिताभ एक 13 साल के बच्चे की भूमिका में प्रोजेरिया (एक ऐसा रोग है जिसमें कम उम्र के बच्चों में भी बुढ़ापे के लक्षण दिखने लगते हैं) से पीड़ित थे।

 

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प्रियंका चोपड़ा और रणबीर कपूर अभिनीत फिल्म ‘बर्फी‘ में प्रियंका चोपड़ा ऑस्टिस्टिक लड़की यानी ऑटिज्म बीमारी से पीड़ित थी। ऑटिज्म एक मानसिक बीमारी है जिसके लक्षण बचपन से ही नजर आने लग जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बच्चों का विकास तुलनात्मक रूप से धीरे होता है।

 

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आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘गजनी‘ में आमिर खान ने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई थी जिसे ऐंटरोग्रेड एमेंसिया यानी कुछ-कुछ अंतराल में भूलने की बीमारी थी। एम्नेसिया बीमारी में 15 मिनट पहले घटी सभी घटनाएं व्यक्ति की याददाश्त से कुछ पल के लिए मिट जातीं है।

 

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रानी मुखर्जी और अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘ब्लैक‘ में अमिताभ बच्चन ने अल्जाइमर पीड़ित रोगी का किरदार निभाया है। इस बीमारी में मस्तिष्क के सेल्स डैमेज हो जाते हैं। नतीजन भूलने की बीमारी हो जाती है।

 

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काजोल ने भी फिल्म ‘यू मी और हम‘ में अल्जाइमर पीड़ित रोगी की भूमिका निभाई है। ब्लैक के बाद ये फिल्म आई थी और काफी चर्चा में रही।

 

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ऋतिक रोशन द्वारा अभिनीत फिल्म ‘गुजारिश‘ में ऋतिक को क्वाड्रोप्लेजिया नामक बीमारी है जो बिना किसी की मदद के वह हिल-डुल भी नहीं सकता। इस बीमारी में व्यक्ति पूरी तरह से पैरालिसिस हो जाता है।

 

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काल्कि कोचलिन अभिनीत फिल्म ‘मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ‘ में काल्कि ने सेरब्रल पॉल्ज़ी (मस्तिष्क पक्षाघात) से पीड़ित लड़की का किरदार निभाया है। इस बीमारी में सामान्य चीजों को करने में भी मरीज को बहुत दिक्कतें आती हैं।

 

 

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शाहरूख खान फिल्म ‘माय नेम इज खान‘ में एस्पर्जर नामक बीमारी से पीड़ित थे। जिन बच्चों में ये रोग होता है उनका विकास अन्य बच्चों की अपेक्षा असामान्य होता है।

 

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फिल्म ‘फिर मिलेंगे‘ में सलमान खान और शिल्पा शेट्टी ने एचआईवी एड्स से पीडित मरीजों की भूमिका निभाई है।

 

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दर्शील सफारी ने फिल्म ‘तारे जमीं पर‘ में बाल कलाकार के रूप में द्य्स्लेक्सिक (dyslexic) से पीड़ित बच्चे की भूमिका थी। इस बीमारी में रोगी को आसान सी चीजें भी मुश्किल जान पड़ती हैं। चीजों को समझने में रोगी को बहुत समय लग जाता है।

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