क्या पीरियड के पहले दिन महिलाओं को छुट्टी मिलनी चाहिए?

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हाल ही में मुंबई की एक डिजिटल मीडिया कंपनी ‘Culture Machine’ ने अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को पीरियड्स के पहले दिन पेड लीव देने की शुरुआत की है। कंपनी का दावा है कि उनका ये कदम महिलाओं के लिए कंपनी में कामकाज का बेहतर महौल बना सकता है।

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कंपनी के इस निर्णय के साथ ही यह मुद्दा मीडिया और सोशल मीडिया में छाया हुआ है और इस पर जोरदार बहस छिड़ी हुई है। महिलाओं के लिए चलाई गई इस मुहिम का तमाम महिलाएं ही खुलकर विरोध कर रही हैं।

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इस बारे में वरिष्‍ठ पत्रकार बरखा दत्त ने भी ट्वीट किया है कि पीरियड्स जैसे मुद्दों पर छुट्टी ठीक नहीं है। कल को यही छुट्टी महिलाओं को पुलिस और सेना जैसी जगहों पर भर्ती नहीं करने की वजह बन सकती है। अपने ट्वीट में बरखा दत्त ने इसे बेकार का आइडिया करार दिया है।

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एक अन्‍य ट्वीट में बरखा दत्त ने कहा है कि पीरियड्स काफी असहज और पीड़ा भरे होते हैं लेकिन यह हमें अपना काम करने से नहीं रोक सकते हैं।

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बरखा दत्त ने लिखा है कि वर्ष 1999 में पीरियड्स के दौरान ही उन्‍होंने कारगिल युद्ध को कवर किया था। बरखा दत्त का यह भी कहना है कि महिलाओं को इस तरह की किसी छुट्टी की जरूरत नहीं है|

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बरखा दत्त के अनुसार, पीरियड्स के पहले दिन महिलाओं को छुट्टी की बात कहकर हम खुद को अलग दिखाते हैं और शारीरिक पहलू को जरूरत से ज्‍यादा महत्‍व देते हैं। अपने ट्वीट में बरखा दत्त का कहना है कि महिलाओं के पीरियड्स से जुड़ी वर्जनाओं को खत्‍म करने की बात कहकर हम इसकी वकालत न करें। हम जैसे हैं, वैसे ही ठीक हैं। बरखा दत्त का समर्थन करते हुए कई अन्‍य महिलाओं का भी यही मानना है कि इस तरह की व्‍यवस्‍था से इस धारणा को बल मिलेगा कि महिलाएं कमजोर है। हालांकि कुछ महिलाएं बरखा दत्‍त की बात से असहमत भी हैं।

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जरा सोचिए, महिला पुलिस अफसर किसी बड़े केस को सुलझाने के आखिरी पड़ाव पर हो और अचानक उसी समय पीरियड्स की छुट्टी पर जाने के लिए छुट्टी की दरख्वास्त दे दे| ऐसे में क्या पुलिस के बड़े अफसर उसे किसी महत्वपूर्ण केस की जांच का हिस्सा बना सकते है क्या? फर्ज कीजिए कि एक बड़ी महिला वकील किसी बड़े केस की अहम सुनवाई वाले दिन पीरियड्स की छुट्टी ले ले, तो क्या होगा? सुनने में ये बात जरूर अटपटी लगती है लेकिन स्वतंत्र पत्रकार सरोज सिंह के साथ ऐसा हुआ है|

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इस बारे में उन्होंने हिन्दी वेबसाइट ‘द क्विंट पर आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल में उन्होंने बताया है कि ऐसा करने से कई चीजें प्रभावित हो सकती हैं और इस बारे में काफी सोच-विचार करके ही निर्णय लेना चाहिए। आर्टिकल में इस बारे में सरोज सिंह ने अपना एक अनुभव भी शेयर किया है। उन्होंने लिखा है, ‘एक निजी न्यूज चैनल में 15 लोगों की टीम की जिम्मेदारी संभालते हुए मैंने एक महिला रिपोर्टर को कृष्ण जन्माष्टमी की कवरेज के लिए मथुरा भेजा और वहां जाकर उसने मुझे फोन किया कि वो मंदिर के अंदर नहीं जा सकती, क्योंकि उसका पीरियड्स शुरू हो गया है। आनन-फानन में उसकी जगह पुरुष रिपोर्टर को भेजना पड़ा।

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लेकिन आज सोच रही हूं कि जिस देश में आज भी पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिलाएं पीरियड्स के दौरान मंदिर न जाने की रुढ़िवादी सोच को नहीं तोड़ पाई है, क्या वहां पीरियड्स में छुट्टी देने की ये मांग जायज है? उससे भी बढ़ा सवाल ये है कि क्या इसी आधार पर तमाम कामकाजी महिलाएं अपने घर पर झाड़ू-पोछा करने, बर्तन मांजने और खाना बनाने वाली महिलाओं को उनकी पीरियड्स के दिनों में छुट्टी देंगी?

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