मांस खाने की गतिविधि वैसे तो बहुत खास नहीं लगती है, लेकिन इसका जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर गहरा असर होता है. ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो, दुनिया भर में जैवविविधता में बढ़ती जा रही कमी हो, स्वच्छ पानी की अधिक उपयोग, ऐसे कई कारक हैं जिन पर मांस उत्पादन के लिए पशुपालन और अन्य प्रक्रियाओं का सीधा असर पड़ता है. और मांस खाना छोड़ने से ये प्रभावी तौर पर कम हो सकता है.
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| मांस खाने का पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव जितना समझा जाता है वास्तव में उससे कहीं ज्यादा पड़ता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay) |
हाइलाइट्स
- मांस उद्योग का जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर गहरा असर होता है.
- इस उद्योग से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन से लेकर जैवविविधता तक की हानी होती है.
- मांस खाने के अनोखे फायदे नहीं होते हैं, उसे पौधों आधारित खुराक से बदला जा सकता है.
क्या इंसान के मांस खाने से पर्यावरण को खासा नुकसान होता है? यह सवाल अजीब सा लगता है क्योंकि दुनिया भर में बढ़ता तापमान, महासागरों का बढ़ता जलस्तर, बदलते और तीखे होते मौसम के तेवर, अनियंत्रित बाढ़ और सूखे, जैसी कई समस्याएं हैं जिनके लिए ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन रोकने के उपायों पर जोर दिया जाता है. लेकिन क्या मांस खाना बंद करने से इसे रोका या कम किया जा सकता है? अगर आंकड़ों और विशेषज्ञों की मानें तो मांस उत्पादन उद्योग पर्यावरण गहरा लेकिन विपरीत असर ड़ालता है और मांस खाना छोड़ने के बहुत व्यापक फायदे हो सकते हैं. मांस खाने का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और यहां तक की इंसान पर भी असर पड़ता है.
मांस उद्योग और ग्रीनहाउस गैस
पूरे भोजन उत्पादन उद्योग ग्रीन हाउसगैस उत्सर्जन करता है. लेकिन इसका 57 फीसद केवल मांस उद्योग से होता है और इसकी गतिविधियां कई प्रकार से पर्यावरण के खिलाफ काम करती हैं. मांस के लिए पशुपालन के चक्कर में बहुत सारी जमीन, खास तौर पर जंगल के पेड़ पौधों का साफ कर दिया जाता है. अमेजन के जंगलों की 80 फीसदी की कटाई की वजह से पशुपालन के लिए जमीन को साफ करना है. वनों की कई से हर साल 34 करोड़ टन कार्बन वायुमंडल में आता है.
जैवविविधता, मिट्टी की उर्वरता और पानी
इतना ही नहीं जमीन साफ करने से पेड़ और कई अन्य जीवजंतुओं की प्रजातियां भी नष्ट हो जाती है. आज दुनिया भर में जो जैवविविधता हानि हो रही है, उसके 60 फीसदी हिस्से के लिए मांस उद्योग जिम्मेदार है. इतना ही नहीं जानवरों को पालते हुए उनके भोजन के लिए अलग से फसल उगाई जाती है जिससे मिट्टी की उत्पादकता प्रभावित होती है. इसके लिए पानी की बेतहाशा इस्तेमाल होता है. पशुपालन में दुनिया के 20 फीसदी साफ पानी की खपत होती है. कसाई खानों में भी पानी का अच्छा खासा नुकसान होता है, जबकि पौधों पर आधारित भोजन उत्पादन में पानी कम लगता है.
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन
मांस उद्योग और उससे जुड़ा पशुपालन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में खासा योगदान देता है. इनमें कार्बनडाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड प्रमुख हैं. ये पशु जो भोजन खाते हैं, वे उसे एन्टरिक फरमनटेशन प्रक्रिया से पचाते हैं जिससे मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड छोड़ते हैं. ये दोनों कार्बन डाइऑक्साइड से कहीं खतरनाक ग्रीनहाउस गैस हैं. जबकि इस उद्योग की अन्य प्रक्रियाएं भी ग्रीनहाउसगैस उत्सर्जन में योगदान देती हैं. मांस उद्योग और उसके लिए पशुपालन से जंगल नष्ट होते हैं, मिट्टी खराब होती है, पानी कम होता है और ग्रीन हाउस उत्सर्जन होता है जो मिलकर जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करते हैं.
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| पश्चिमी देशों में पशुपालन प्रमुख तौर पर मांस उद्योग के लिए किया जाता है जो पर्यावरण के लिए बहुत नुकसानदेह होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock) |
कम नहीं है जलवायु परिवर्तन में हिस्सेदारी
आमतौर पर मांस के पक्ष में उच्च मात्रा के प्रोटीन होने की दलील दी जाती है. केवल मांस में से 100 ग्राम प्रोटनी करीब 50 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार होता है. जबकि उससे ज्यादा मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करता है जो वायुमंडल के लिए ज्यादा खतरनाक है. पशुपालन उद्योग की वैश्विक ग्रीन हाउस उत्सर्जन में 16.5 फीसदी हिस्सेदारी है. जब कि यह वैश्विक भोजन उत्पादन को केवल 18 फीसदी कैलोरी देता है.
मांस छोड़ने के फायदे?
इन आंकड़ों से जाहिर होता है कि अगर मांसउद्योग का उत्पादन कम हो जाए तो उसका अच्छा खासा असर देखने को मिल सकता है. इसके लिए लोगों को मांस की जगह पौधों पर आधारित खुराक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा. इससे जानवरों कम पाला जाएगा, उनकी हत्या की संख्या में कमी आएगी और खाद्य तंत्र के पर्यावरण पर असर में भी खासी कमी आएगी. मांस ना खाने से बहुतसारा भूमि उपयोग भी बच सकता है. वहीं मांस के पक्ष में दलील दी जाती है कि इससे विटामिनबी12 और जिंक सहित खासा पोषण मिलता है जो हर जगह उपलब्ध नहीं होता है.
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| पौधों पर आधारित खुराक अपनाने से पर्यावरण को अच्छा खासा फायदा हो सकेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay) |
बढ़ने लगी है जागरूकता
दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो मांस के नुकसान और खतरे से वाकिफ हैं और वे खुद को वेजिटेरियन या वीगन बना रहे हैं. कई विशेषज्ञ दावा करते हैं कि मांस खाने से 25 तरह की सेहत संबंधी समस्याएं हो सकती हैं लेकिन इन जोखिमों को सोयाबीन, फलियां आदि के विकल्पों के उपयोग से बचा जा सकता है. मांस उत्पादन घटने से पर्यावरण को होने वाला फायदा इंसानों की ही मिलेगा. इससे अलावा हर साल 88 अरब से ज्यादा जानवरों को मरने से अधिकांश को बचाया जा सकेगा.
इसमें कोई संदेह नहीं कि खुराक में बदलाव जदलायु परिवर्तन और पर्यावरण के लिए लाभकारी साबित होगा. यह बदलाव बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है. इसमें एक बात ध्यान में रखना जरूरी है कि जोर केवल मांस खाना बंद करने पर ही नहीं देना होगा बल्कि मांस की मात्रा और उसकी खुराक की संख्या में खासी कमी भी बड़ा बदलाव लाने में मददगार हो सकती है. एक अध्ययन में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर पौधों पर आधारित खुराक अपनाने से खाद्य उत्पादन की वजह से होने वाले ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन 2050 तक 70 फीसदी कम हो जाएगा.



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